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Aslam Azad

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Prof Aslam Azad

Aslam Azad: प्रो असलम आजाद का निधन

प्रो असलम आजाद (फाइल फोटो)
असलम आजाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के उर्दू के शिक्षक भी थे और कुछ महीनों तक मुख्यमंत्री को उन्होंने उर्दू की तालीम दी थी। वो कहा करते थे की अगर नीति निर्माता उर्दू पढ़ने लगे तो फिर इस भाषा के विकास का मसला हमेशा के लिए हल हो जाएगा।

जेडीयू के पूर्व एमएलसी प्रो असलम आजाद का आज पटना के एम्स में निधन हो गया। वो काफी दिनों से बीमार थे। 72 वर्ष की उम्र में असलम आजाद इस दुनिया से रुखसत हो गए। असलम आजाद बिहार के सीतामढ़ी जिले के मौला नगर गांव के रहने वाले थे लेकिन पूरी जिंदगी पटना में गुजारी। पटना विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में शिक्षक रहे, उसी विभाग के विभागाध्यक्ष बने और पूरी जिंदगी उर्दू के विकास और उर्दू के मसले को हल करने की जद्दोजहद में गुजारी। जेडीयू ने उन्हें अपना एमएलसी बनाया था। 2006 से 2012 तक वो विधान परिषद में जेडीयू की नुमाइंदगी करते रहे। इस दरमियान उन्होंने समाज के विभिन्न मसलो को उठाया और सरकार से उसे हल कराने की कोशिश की। Aslam Azad एक दर्जन किताबों के लेखक हैं। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी अपनी मर्जी के मुताबिक गुजारी। उर्दू के लेखक होने और उर्दू दुनिया के एक अजीम शख्सियत होने के बाद भी वो किसी की आलोचना करने से हमेशा परहेज करते रहे। आमतौर से उर्दू साहित्य से जुड़े लोग एक दूसरे पर हमेशा आलोचना करते रहते हैं लेकिन असलम आजाद को इससे कोई लेना देना नहीं था।

असलम आजाद के निधन पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, विपक्ष के नेता तेजस्वी प्रसाद यादव और दर्जनों सियासी नेताओं ने अपना शोक व्यक्त किया है। उर्दू दुनिया में असलम आजाद के निधन पर गम का माहौल कायम है।

असलम आजाद ने एमएलसी रहते हुए भी अल्पसंख्यकों की समस्याओं पर हमेशा अपनी आवाज बुलंद की। उर्दू के मसले पर सरकार को घेरा। वो हमेशा इस बात को लेकर दुखी रहे कि सरकारी स्कूलों में उर्दू के शिक्षकों की सीटें खाली रह जाती है और सरकार उनकी नियुक्ति में टालमटोल का रवैया अपनाती है। असलम आजाद आखिरी दिनों तक उर्दू के विकास की कोशिश करते रहे। समाज की अलग-अलग समस्याओं पर उनकी गहरी नजर थी और वो उन मसलो को हल कराने की कोशिश करते रहते थे।

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मुख्यमंत्री को उर्दू पढ़ाया था

असलम आजाद को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से काफी लगाव था। वो जब भी बिहार की बात करते तो नीतीश कुमार को विकास के मामले में एक कदम आगे रखते थे। Aslam Azad कहा करते थे की बिहार की तरक्की के लिए नीतीश कुमार (Chief Minister Nitish Kumar) ने एक अलग अंदाज में सोचा और काम की शुरुआत की। अल्पसंख्यकों के सवाल पर वो नीतीश कुमार की पार्टी और लालू प्रसाद की पार्टी को कटघरे में भी खड़ा करते थे। उनका कहना था की तमाम सियासी पार्टियां मुसलमानों का वोट तो लेती है लेकिन मुसलमानों को मुख्य धारे से जोड़ने में परहेज करती है। अकलियतों को न ही सियासी हिस्सेदारी दी जाती है और न ही सरकारी योजनाओं में उनको मुनासिब भागीदारी मिलती है। Aslam Azad उर्दू के विकास को लेकर फिक्रमंद रहते थे और जब भी मौका मिलता था मुख्यमंत्री को इस सिलसिले में मशवरा देते थे। असलम आजाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के उर्दू के शिक्षक भी थे और कुछ महीनों तक मुख्यमंत्री को उन्होंने उर्दू की तालीम दी थी। वो कहा करते थे की अगर नीति निर्माता उर्दू पढ़ने लगे तो फिर इस भाषा के विकास का मसला हमेशा के लिए हल हो जाएगा। असलम आजाद को सीतामढ़ी में उनके गांव मौला नगर में आज रात सुपुर्द खाक किया जाएगा। असलम आजाद के निधन पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, विपक्ष के नेता तेजस्वी प्रसाद यादव और दर्जनों सियासी नेताओं ने अपना शोक व्यक्त किया है। उर्दू दुनिया में असलम आजाद के निधन पर शोक का माहौल कायम है। बुद्धिजीवियों का कहना है कि ऐसी शख़्सियतें दुनिया में कभी-कभी पैदा होती है। अजीमाबाद के लोगों ने असलम आजाद के लिए दुआ की है कि अल्लाह तआला उनको जन्नतुल फिरदौस में आला मुकाम और उनके अहले खाना को इस मौके पर सब्र अत्ता करें।

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